रोटी वाले बाबा रोज़ आते है हास्पिटल

द्वारका प्रसाद ने बताया28 साल हो गए। कोई दिन ऐसा नहीं रहा जब हिसार सिविल अस्पताल में मरीजों और उनके परिवार वालों के लिए भोजन लेकर 80 वर्ष के बुजुर्ग वे न पहुंचे हों। तीनों वक्त, बिना नागा। सुबह नाश्ता और चाय, दोपहर और रात को भोजन लेकर। समय तय है। एक मिनट भी लेट हो गए तो मरीजों और तीमारदारों की नजरें गेट पर टिक जाती हैं। कब रिक्शे पर बाबा खाना लेकर आएंगे? लोग उन्हें अब रोटी वाला बाबा भी बोलने लगे हैं।

बुजुर्गवार लेट होने पर खुद भी परेशान हो उठते हैं। भोर होते ही चाय व ब्रेड लेकर तो दोपहर में रोटी और सब्जी लेकर पहुंचते हैं। रात में सब्जी-रोटी के साथ दाल-चावल और दूध भी होता है। महीने में चार बार हलवा व खीर लेकर आते हैं।

द्वारका प्रसाद बताते हैं कि मरीजों और तीमारदारों को खाना खिलाने पर लगभग एक लाख रुपये प्रतिमाह खर्च आता है, जिसे ट्रस्ट वहन करता है। ट्रस्ट के संस्थापक स्वामी गणोशानंद महाराज हैं, जिनकी प्रेरणा से वह सेवा में जुटे हैं। द्वारका दास पांच स्कूलों की प्रबंधन समितियों के महासचिव हैं।

हिसार में ही राजगढ़ रोड पर कबीर छात्रवास है। यहां के चार छात्र राजकुमार, गोविंद, अजीत और विकास भी बुजुर्गवार के नक्शेकदम पर चल रहे हैं। छात्रवास में रात के समय खाना बच जाता है, जिसे चारों रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर ले जाते हैं और भूखे सो रहे यात्रियों को जगाकर खिलाते हैं।

राजकुमार ने बताया कि वह पढ़ाई के साथ-साथ पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। कई बार भर्ती के लिए बाहर जाना पड़ता है। कभी पैसों की कमी या अधिक रात होने के कारण रेलवे स्टेशन पर उन्हें भूखे ही सो जाना पड़ा। तभी मन में ख्याल आया कि ऐसे कई लोग होंगे, जो भूखे सो रहे होंगे। सोचा हॉस्टल में रात को बचने वाला खाना क्यों न ऐसे लोगों को खिला दिया जाए। इसकी चर्चा हॉस्टल के प्रधान जोगीराम खुंडिया से की। उन्होंने रात में बचे हुए भोजन को रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन पर जरूरतमंद यात्रियों को वितरित करने की बात खुशी खुशी मान ली और भोजन वितरण का सिलसिला शुरू हो गया।

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