मुस्लिम कलाकार ने एक बार फिर साबित किया की कला का कोई धर्म नई होता ये तो हर भेद – भाव से परे है

भारत के परंपरागत सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बना है असम का एक कलाकार, जिसने आज के चुनौतीपूर्ण समय में एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कला और संस्कृति मानव नर्मिति धर्म-जाति के सभी सामाजिक विभेदों से परे हैं।

असम के प्रख्यात कला नर्दिेशक नुरुद्दीन अहमद हाल के दिनों में गुवाहाटी के एक पंडाल में मां दुर्गा की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने के लिए सुर्खियों में हैं। अहमद ने बिशुनपुर दुर्गा पूजा पंडाल में बांस से 110 फीट ऊंची दुर्गा प्रतिमा बनाई। उन्होंने गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड को अर्जी देकर इस प्रतिमा को दुनिया में बांस से बनी सबसे ऊंची प्रतिमा की मान्यता देने का आग्रह किया है।

अहमद अपनी कला के लिए अतीत में राष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार जीत चुके हैं। लेकिन, उनकी इस प्रतिमा का महत्व आज के समय के संदर्भ में बहुत खास हो जाता है जब कुछ असामाजिक तत्व धार्मिक उन्माद फैलाकर देश में अस्थिरता लाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं.

अहमद के कहा, जन्म से मैं मुसलमान हूं, लेकिन मेरे काम के रास्ते में धर्म कभी आड़े नहीं आया। मैं एक कलाकार हूं और मेरी चाहत एक कलाकृति बनाने की होती है। मैं ऐसा 1975 से कर रहा हूं। असम के उत्तरी लखीमपुर जिले में पैदा हुए अहमद 1975 से दुर्गा प्रतिमा बना रहे हैं। वह अब तक करीब 200 दुर्गा प्रतिमाएं बना चुके हैं और असम में कई पूजा पंडालों को डिजाइन कर चुके हैं।

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